16 साल के नीग्रो बच्चे ने किया केस कहा झूठा है Fair & Lovely
May 13, 2018

मुझे बिन गददी के साइकिल चलना अच्छा लगता है: लेह-लदाख की सच्ची घटना

ज़िन्दगी एक बार मिलती है , कुछ बड़ा करो. मध्य वर्गीय जैन परिवार में जन्मे पार्शव खुद को इस दुनिया की भीड़ से अलग मानते हैं . मनाली के रास्ते लेह-लदाख तक 600 KM का सफर पार्शव ने बिना गद्दी की साइकिल से पूरा किआ. ढेर सारा जज़्बा , कुछ पैसा और थोड़ी सी हिम्मत लिए पार्शव जैन निकाल पड़े लेह की खूबसूरत वादियों के बीच.

लगभग एक महीने का कड़ा सफर करके घर लौटे पार्शव ने अपनी आप बीती हमारे संवादाता अखिलेश पांडेय को एक इंटरव्यू मैं बताया.

संवादाता  (अखिलेश): कैसा महसूस कर रहें हैं आप?

पार्शव: मैं पहले से  काफी कॉंफिडेंट महसूस कर रहा हूँ. इस सफर के बाद मेरी ज़िन्दगी में काफी अच्छे परिवर्तन आ गए हैं.

 

संवादाता  (अखिलेश): ऐसा करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

पार्शव: मुझसे पहले भी कई लोग साइकिल से लेह तक गए हैं लेकिन मुझे सबसे कुछ अलग करना था, इस लिए मैंने गददी हटाने का फैसला किआ. सच पूछो तो  मैं बचपन से ही कुछ बड़ा करना चाहता था, आखिर मैंने कर ही लिया!

 

संवादाता  (अखिलेश): कितना आसान या मुश्किल था आपके लिए ये सफर ?

पार्शव:गददी हटाकर साइकिल के डंडे पे बैठना आसान नहीं था. सफर के शुरुवात में मुझे भी काफी तकलीफ का सामना करना पड़ा लेकिन आगे चल के ये तकलीफ मज़ा बन गयी.

 

संवादाता  (अखिलेश): रास्ते मैं क्या क्या तकलीफें हुई और इनको आपने कैसे पार किया?

पार्शव:  तेज बारिश और चील चिलाती ठण्ड के बीच इतना सारा सामान लेके चलना आसान नहीं था लेकिन गददी  हटा के साइकिल चलाना यहीं काम आया. दरासल सफर के मध्य तक ही मेरी गां* का गुल्लक बन चूका था. मैं सारा सामन अंदर डाल लिया करता था .

 

संवादाता  (अखिलेश): आगे का आपका क्या प्लान है ?

पार्शव:  मेरा खोया हुआ प्यार मुझे वापिस मिल गया है. मैं अभी तो सिर्फ साइकिल चलना चाहता हूँ. जल्द ही मैं दूसरा ट्रिप बनाऊगा.

Disclaimer: इस कहानी का फिलहाल वास्तविकता से कोई नाता नहीं है, क्या पता आगे हो जाये|

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